Monday, April 4, 2016

भारत कि नदियों में प्रदुषण का बढ़ता बोझ।


द्वारा
डा नितीश प्रियदर्शी
भूवैज्ञानिक

रांची







पिछले कुछ वर्षों में औद्योगिकीकरण एवं शहरीकरण के कारण भारत कि प्रमुख नदियों में प्रदूषण का बोझ बढ गया है। सिंचाई, पीने के लिए, बिजली तथा अन्य उद्देश्यों के लिए पानी के अंधाधुंध इस्तेमाल से चुनौती काफी बढ गयी है।

गंगा और यमुना सदियों से करोड़ों लोगों के लिए उनसे कई गुना अधिक जल-जीवों, पशु-पक्षियों के लिए जीवनदायिनी भूमिका निभाती रही हैं पर हाल के सालों में इन नदियों पर अधिक चर्चा इनके प्रदूषण और इन पर मंडरा रहे अन्य खतरों के संदर्भ में हुई है।

पिछले कुछ सालों में सरकारी, गैर-सरकारी स्तर पर इन नदियों की रक्षा के लिए कुछ प्रयास भी आरंभ हुए हैं। गंगा यमुना एक्शन प्लान इस उद्देश्य के लिए ही बनाए गए। पर इसमें सीमित सफलता ही मिल पाई है। 11वीं योजना के दस्तावेज ने मार्च से जून 2006 के आंकड़ों के आधार पर बताया है कि कन्नौज से इलाहाबाद तक अभी गंगा का पानी स्नान करने योग्य गुणवत्ता को भी प्राप्त नहीं कर पाया है। यमुना के बारे में बताया गया कि इसकी स्थिति बहुत विकट है।
उत्तरप्रदेश के पूर्वांचल को हराभरा रखने वाली एक दर्जन से ज्यादा नदियाँ मृतप्राय हो चुकी हैं। जो बची हैं उनके अस्तित्व पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। गंगा समेत सभी नदियाँ या तो प्रदूषण की मार झेल रही हैं या सूख गई हैं। नदियों के सूखने एवं उनके जल स्तर में हो रही कमी की खबरें जिस तरह से रही हैं वे किसी त्रासदी से कम नहीं हैं।

पूर्वी उत्तरप्रदेश के जिलों में जिस तरह से भूजल स्तर गिरता जा रहा है एवं पानी का संकट गंभीर होता जा रहा है, यह चिंता का विषय है। जौनपुर में गोमती एवं पीली नदी का यही हाल है। गोमती की हालत खस्ता है। पीली नदी में पानी का नामोनिशान नहीं है। गाजीपुर में मगई नदी सूख चली है। नदी की तलहटी में धूल उड़ रही है। गड़ई, तमशा, विषही, चंद्रप्रभा एवं सोन नदियों की भी हालत बदतर है। गर्मी शुरू होते-होते ये नदियाँ सूख जाती हैं और उनमें केवल धूल उड़ती रहती है।
स्था का सार्वजनिक प्रदर्शन अब पर्यावरण पर भारी पड़ रहा है। हर साल हमारे देश में कई स्थानों पर जोर-शोर से गणेशोत्सव मनाया जाता है और उसके बाद जगह-जगह दुर्गा पूजा का आयोजन होता है। एक स्थूल अनुमान के मुताबिक हर साल लगभग दस लाख मूर्तियां नदी, तालाबों और झीलों के पानी के हवाले की जाती हैं और उन पर लगे वस्त्र, आभूषण में पानी में चले जाते हैं।

चूंकि ज्यादातर मूर्तियां पानी में घुलने वाले प्लास्टर आफ पेरिस से बनी होती है, उन्हें विषैले एवं पानीे में घुलने वाले नॉन बायोडिग्रेडेबेल रंगों में रंगा जाता है, इसलिए हर साल इन मूर्तियों के विसर्जन के बाद पानी की बॉयोलॉजिकल आक्सीजन डिमांड तेजी से घट जाती है जो जलजन्य जीवों के लिए कहर बनता है। चंद साल पहले मुम्बई से वह विचलित करने वाला समाचार मिला था जब मूर्तियों के धूमधाम से विसर्जन के बाद लाखों की तादाद में जुहू किनारे मरी मछलियां पाई गई थीं।

केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा दिल्ली में यमुना नदी का अध्ययन इस संबंध में आंखें खोलने वाला रहा है कि किस तरह नदी का पानी प्रदूषित हो रहा है। बोर्ड के निष्कर्षों के मुताबिक नदी के पानी में पारा, निकल, जस्ता, लोहा, आर्सेनिक जैसी भारी धातुओं का अनुपात दिनोंदिन बढ़ रहा है।

दिल्ली के जिन-जिन इलाकों में मूर्तियां बहाई जाती हैं वहां के पानी के सैंपलों को लेकर अध्ययन करने के बाद बोर्ड ने पाया कि मूर्तियां बहाने से पानी की चालकता, ठोस पदार्थों की मौजूदगी, जैव रासायनिक आक्सीजन की मांग और घुले हुए आक्सीजन में कमी बढ़ जाती है। पांच साल पहले उसने अनुमान लगाया था कि हर साल लगभग 1799 मूर्तियां दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में बहाई जाती हैं और उसका निष्कर्ष था कि इस कर्मकाण्ड से नदी को कभी भरने लायक नुकसान हो रहा है और प्रदूषण फैल रहा है।

सबसे ज्यादा जल प्रदूषण प्लास्टर आफ पेरिस से बनी मूर्तियां के विसर्जन से होता है। इन मूर्तियों में प्रयुक्त हुए रासायनिक रंगों से भी जल प्रदूषण ज्यादा होता है। पूजा के दौरान हुआ ऐसा कचरा, जिसकी रिसाइकलिंग नहीं की जा सकती है, उससे भी जल प्रदूषण अधिक मात्रा में होता है। पिछले कई सालों से यह बात प्रकाश में आई है कि जल प्रदूषण सबसे ज्यादा प्लास्टर आफ पेरिस (पीओपी) की बनी मूर्तियों गणेश, दुर्गा के विसर्जन से होता है। ये सभी मूर्तियां झीलों, नदियों एवं समुद्रों में बहाई जाती है जिससे जलीय वातावरण में समस्या सामने आती है।

प्रदूषण रोकने के लिए  बरसों से कई बड़ी परियोजनाएं भी चल रही हैंI लेकिन नतीजे देखें तो वही ढाक के तीन पात”. प्रदूषण से हालात इतने भयावह हो गए हैं कि पेय जल तक का संकट गहरा गया है I राजधानी दिल्ली के 55 फीसद लोगों की जीवनदायिनी, उनकी प्यास बुझाने वाली- यमुना के पानी में जहरीले रसायनों की मात्रा इतनी बढ़ गई है कि उसे साफ कर पीने योग्य बनाना तक दुष्कर हो गया है

गंगा-यमुना को प्रदूषण मुक्त करने के लिए सरकार अब तक 15 अरब रुपये से अधिक खर्च कर चुकी है लेकिन उनकी वर्तमान हालत 20 साल पहले से कहीं बदतर है I गंगा को राष्ट्रीय नदी का दर्जा दिए जाने के बावजूद इसमें प्रदूषण जरा भी कम नहीं हुआ है I करोड़ों रुपये यमुना की भी सफाई के नाम पर बहा दिए गए, मगर रिहाइशी कॉलोनियों कल-कारखानों से निकलने वाले गंदे पानी का कोई माकूल इंतजाम नहीं किया गया I

झारखंड में बहने वाली नदी दामोदर को किसी जमाने में भले ही बंगाल का शोक कहा गया हो मगर इसे झारखंड का लाइफ लाइन होने का दर्जा प्राप्त है। अफसोस की बात है कि यह नदी लाइफ लाइन की जगह अब डेथलाइन में बदलती जा रही है। पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण विभाग ने इस नदी के जल में प्रदूषण की मात्रा को देखते हुए इस नदी को सी श्रेणी में शामिल किया है और इसके पानी को पीने यो' बिल्कुल भी नहीं माना है। दामोदर में स्नान की बात अब कोई नहीं करता है।दामोदर नदी के पानी में सीओडी ((केमिकल ऑक्सीजन डिमांड)) एवं बीओडी((बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड)) की मात्रा खतरनाक हद तक पहुंच चुकी है।

झारखंड की गंगा (सुवर्णरेखा) अब नहाने लायक भी नहीं रही। कुछ वर्षों पहले तक इसका पानी आसपास के लोगों के लिए अमृत समान था, लेकिन आज यह इतनी प्रदूषित हो गई है कि इसमें नहाया, चर्म रोग और पानी पीया, तो किडनी फेल होने की आशंका रहती है। यही वजह है कि पानी पीना तो दूर, शहर आसपास के लोग इसमें स्नान करने से भी कतराने लगे हैं।सुवर्णरेखा के पानी में घुलनशील ऑक्सीजन (डिजॉल्व ऑक्सीजन यानी, डीओ) हाइड्रोजन (पीएच) की मात्रा मानक स्तर से कम लेड, कैडमियम आदि तत्वों की मात्रा खतरनाक स्थिति पर पहुंच गई है। यह जलजीवों के साथ-साथ आसपास रहने वाले लोगों के लिए भी चिंताजनक है।

गोमती नदी में जलजीवों की संख्या तेजी से घट रही है। आकलन के मुताबिक 1950 की तुलना में मछलियों की संख्या एक तिहाई से भी कम हो गई है। वहीं कछुवे विलुप्त होने के कगार पर हैं। तटवासियों के अनुसार कछुवे की संख्या 1950 की तुलना में मात्र 10 प्रतिशत रह गई है।नदी में केवल पानी की मात्रा ही कम नहीं हुई है, बल्कि उपलब्ध जल की गुणवत्ता भी काफी घटिया हो गई है। पानी में प्रदूषण की सूचना तटवासियों ने दी है। पानी की गुणवत्ता इतनी खराब हो जाती है कि जानवर भी उसे पीना तो दूर सूंघकर भाग खड़े होते हैं। गोमती नदी में ऑक्सीजन की भारी कमी के कारण अब तक लाखों मछलियां मारी जा चुकी हैं।जहां एक ओर गोमती नदी में नालों के जरिए सीवर का पानी गिरता है, वहीं कई फैक्ट्रियों की ओर से जहरीला पानी भी नदी में छोड़ा जा रहा है, जिससे नदी नाले में तब्दील होती जा रही है।

मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से नर्मदा के जल की शुध्दता जांचने के लिए किए गए एक परीक्षण में पता चला है कि अमरकंटक में नर्मदा सबसे ज्यादा मैली है। सरकार द्वारा कराई जाने वाली जांचों के आंकड़े चौकाने वाले हैं। जानकार सूत्रों के अनुसार अमरकंटक और ओंकारेश्वर सहित अन्य स्थानों पर नर्मदा के जल में क्लोराइड और घुलनशील कार्बन डाई आक्साइड का स्तर खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है। लगातार मिल रही गंदगी के कारण नर्मदा का पीएच भारतीय मानक 6.5 से 8.5 के स्तर से बढ़कर 9.02 पीएच तक पहुंच गया है। इस प्रदूषित जल को पीने से लोग पेट संबंधी बीमारियों के शिकार हो रहे हैं।


अगर भारत की नदियों के प्रदुषण का यही हाल रहा तो आने वाले समय में या तो ये गायब हो जाएँगी या नालों में परिवर्तित हो जाएँगी। 


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