Wednesday, July 6, 2016

रांची की हवा में घुलता जहर।





रांची शहर पिछले कई वर्षों से वायु प्रदुषण की चपेट में आता जा रहा है। 
द्वारा
डा नितीश प्रियदर्शी।




वायुमण्डल पर्यावरण का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। मानव जीवन के लिए वायु का होना अति आवश्यक है। वायुरहित स्थान पर मानव जीवन की कल्पना करना करना भी बेकार है क्योंकि मानव वायु के बिना 5-6 मिनट से अधिक जिन्दा नहीं रह सकता। एक मनुष्य दिन भर में औसतन 20 हजार बार श्वास  लेता है। इसी श्वास के दौरान मानव 35 पौण्ड वायु का प्रयोग करता है। यदि यह प्राण देने वाली वायु शुद्ध नहीं होगी तो यह प्राण देने के बजाय प्राण ही लेगी।

हमारे वायुमण्डल में नाइट्रोजन, आक्सीजन, कार्बन डाई आक्साइड, कार्बन मोनो आक्साइड आदि गैस एक निश्चित अनुपात में उपस्थित रहती हैं। यदि इनके अनुपात के सन्तुलन में परिवर्तन होते हैं तो वायुमण्डल अशुद्ध हो जाता है, इसे अशुद्ध करने वाले प्रदूषण कार्बन डाई आक्साइड, कार्बन मोनो आक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइड, हाइड्रोकार्बन, धूल मिट्टी के कण हैं जो वायुमण्डल को प्रदूषित करते हैं। आवागमन के साधनों की वृद्धि आज बहुत अधिक हो रही है। इन साधनों की वृद्धि से इंजनों, बसों, वायुयानों, स्कूटरों आदि की संख्या बहुत बढ़ी है। इन वाहनों से निकलने वाले धुएँ वायुमण्डल में लगातार मिलते जा रहे हैं जिससे वायुमण्डल में असन्तुलन हो रहा है।

वनों की कटाई से वायु प्रदूषण बढ़ा है क्योंकि वृक्ष वायुमण्डल के प्रदूषण को निरन्तर कम करते हैं। पौधे हानिकारक प्रदूषण गैस कार्बन डाई आक्साइड को अपने भोजन के लिए ग्रहण करते हैं और जीवनदायिनी गैस आक्सीजन प्रदान करते हैं, लेकिन मानव ने आवासीय एवं कृषि सुविधा हेतु इनकी अन्धाधुन्ध कटाई की है और हरे पौधों की कमी होने से वातावरण को शुद्ध करने वाली क्रिया जो प्रकृति चलाती है, कम हो गई है। यदि वायुमण्डल में लगातार अवांछित रूप से कार्बन डाइ आक्साइड, कार्बन मोनो आक्साइड, नाइट्रोजन, आक्साइड, हाइड्रो कार्बन आदि मिलते रहें तो स्वाभाविक है कि ऐसे प्रदूषित वातावरण में श्वास लेने से श्वसन सम्बन्धी बीमारियाँ होंगी। साथ ही उल्टी घुटन, सिर दर्द, आँखों में जलन आदि बीमारियाँ होनी सामान्य बात है।

रांची शहर पिछले कई वर्षों से वायु प्रदुषण की चपेट में  आता जा रहा है।  जहाँ १९६० -१९७० के दशक में यहाँ की जलवायु स्वास्थयवर्धक मानी जाती थी। रांची में प्रकृति ने अपने सौंदर्य को खुलकर लुटाया है। प्राकृतिक सुन्दरता के अलावा रांची ने अपने खूबसूरत पर्यटक स्थलों के दम पर विश्व के पर्यटक मानचित्र पर भी पुख्ता पहचान बनाई है।  आज इसी के वातावरण में विषाक्त कण तेज़ी से बढ़ रहे हैं।  जो रोग दिल्ली जैसे शहरों में उभर रहे हैं अब रांची में भी  पाँव पसार रहे हैं जैसे अस्थमा, श्वसन सम्बन्धी बीमारियां, आँखों में जलन तथा पानी  आना आदि। यहाँ भी छोटे बच्चों में   श्वसन सम्बन्धी  रोग तेज़ी से फ़ैल रहा है। वातावरण में पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) 2.5 की मात्रा बढ़ने से दिल का दौरा पड़ सकता है। यह बहुत ही सूक्ष्म कण होता हो जो सांस के ज़रिये इंसान के खून में मिलकर दिल तक पहुंचता है जिससे दिल का दौरा पड़ता है।


वाहनों के द्वारा उत्सर्जित जहरीले पदार्थों में प्रमुख हैं, कार्बन डाइऑक्साइड , कार्बन मोनोऑक्साइड , सल्फर डाइऑक्साइड इत्यादि।  लेखक ने पाया की रांची में दो पहिए वाहन . से . प्रतिशत तक कार्बन मोनोऑक्साइड वातावरण में छोड़ रहे हैं  और एक कार औसतन ५०० पीपीएम ( पार्ट्स पर मिलियन ) हाइड्रोकार्बन वातावरण में उत्सर्जित कर रहा है।   अगर अकेले इनकी तुलना करें तो ये उत्सर्जन काफी कम है लेकिन हज़ारों को लेके चलें तो यही उत्सर्जन रोजाना कई हज़ार गुणा बढ़ जाता है। यही हाल बड़ी गाड़ियों की वजह से भी हुआ है।  झारखण्ड बनने के बाद बड़ी गाड़ियों की बेतहाशा वृद्धि हुई है जिसमे प्रमुख है डीज़ल गाड़ियां। एक स्वचालित वाहन द्वारा एक गैलन पेट्रोल के दहन से लगभग 5x20 लाख घनफीट वायु प्रदूषित होती है।  शहर में पेड़ कम हो जाने की वजह से  कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है।  क्योंकि पेड़  को सोख्ता है।

रांची में कई जगहों पर सड़क के किनारे और दुकानों के सामने खुले में डीज़ल जनरेटर रखे हुए हैं।  इनके चलने से भी हवा में कार्बन की मात्रा बढ़ रही है। 

रांची शहर में सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र हैं रातू रोड , मेनरोड, लालपुर , फिरायालाल चौक , अपर बाजार  एवं कांटाटोली चौक।  खासकर शाम के समय जब ये क्षेत्र ट्रैफिक जाम से प्रभावित रहता है उस वक़्त जहरीले गैस ज्यादा वातावरण में उत्सर्जित होते हैं। भवनों की अधिकता की वजह से ये गैस  वही फंस  जाते है  और काफी समय तक वही रहते हैं।  एक बार कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में जाये तो ये ११२ वर्ष तक वातावरण में रह सकता है अगर ये पेड़ों के द्वारा इसका इस्तेमाल किया गया हो।

आम राय यह है की यदि कार्बन डाइऑक्साइड को कम करना है तो अधिक से अधिक वृक्ष लगाएं क्योंकि हरे पौधे प्रकाश संश्लेषण हेतु कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रहण करते हैं एवं ऑक्सीजन छोडते हैं।  रांची में वायु प्रदुषण के बढ़ने से ऑक्सीजन के घटने का भी खतरा है।

यही नहीं रांची शहर से धीरे हरियाली कम होते जा रही है जिसके चलते धूल प्रदुषण बढ़ा  है।  धूल भरी आंधी का उड़ना अब आम बात हो गई है जो पहले नहीं होती थी। इसमें  धूल के बहुत सूक्ष्म कण होते हैं जो फेफड़े को प्रभावित करते हैं।  इस सुक्ष्म कणो के साथ विषैले  भरी धातु भी होते हैं जो हमारे खून में आके स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। 

रांची शहर में कई जगह लोग खुले में घरेलू कचरों को जलाते है जो और भी खतरनाक है। इन कचरों में प्रमुख है प्लास्टिक , हॉस्पिटल वेस्ट , इत्यादि  इसको जलाने  से कई तरह के जहरीले गैस एवं पदार्थ वातावरण में प्रवेश करते हैं जैसे कार्बन डाइऑक्साइड , डायोक्सीन , लिड , पारा , नाइट्रोजन ऑक्साइड इत्यादि। 


अगर रांची शहर को वायु प्रदुषण से बचाना है तो अधिक से अधिक मात्रा में बड़े और चौड़े पत्तों का पेड़ लगाना जरुरी है। वाहनों में ईंधन से निकलने वाले धुएँ को ऐसे समायोजित, करना होगा जिससे की कम-से-कम धुआँ बाहर निकले। और खुले में कचरे को जलने से बचना होगा।

Tuesday, June 28, 2016

वर्षा जल संचयन में जरुरी है कुछ सावधानियाँ।


रांची में वर्षा जल संचयन पर एक रिपोर्ट।
द्वारा
डा नितीश प्रियदर्शी
भूवैज्ञानिक

वर्षा जल संचयन ( वाटर हार्वेस्टिंग ) वर्षा के जल को किसी खास माध्यम से संचय करने या इकट्ठा करने की प्रक्रिया को कहा जाता है। विश्व भर में पेयजल की कमी एक संकट बनती जा रही है। इसका कारण पृथ्वी के जलस्तर का लगातार नीचे जाना भी है। झारखण्ड भी इससे अछूता नहीं है। इसके लिये अधिशेष मानसून अपवाह जो बहकर सागर में मिल जाता है, उसका संचयन और पुनर्भरण किया जाना आवश्यक है, ताकि भूजल संसाधनों का संवर्धन हो पाये। अकेले भारत में ही व्यवहार्य भूजल भण्डारण का आकलन २१४ बिलियन घन मी. (बीसीएम) के रूप में किया गया है जिसमें से १६० बीसीएम की पुन: प्राप्ति हो सकती है। इस समस्या का एक समाधान जल संचयन है। रांची में भी सरकार की तरफ से वर्षा जल संचयन क़ो अनिवार्य किया गया है।  वर्षा जल संचयन विधि को अपनाने से पहले कुछ बिंदुओं पर ध्यान देना आवश्यक है वर्ना ये सफल नहीं होगा।

१. क्या रांची शहर का भूवैज्ञानिक सर्वे हुआ की कौन सा स्थान उपयुक्त है वाटर हार्वेस्टिंग के लिए ?  क्योंकि रांची की चट्टानें अपरदित और कायांतरित है और कई जगह  तो हार्ड रॉक है और छिद्र युक्त  भी नहीं है जो भूमिगत वर्षा जल संचयन के लिए उपयुक्त नहीं है।  दो साल पहले जिन लोगो ने वर्षा जल संचयन की विधि अपनाई थी इस वर्ष वो काम नहीं किया। 

रांची की चट्टानें दूसरे राज्यों की चट्टानों से अलग हैं खासकर दक्षिण भारत एवं उत्तर भारत की।  इसलिए जो विधि वहाँ अपनाई जाती है ठीक वैसा ही यहाँ नहीं अपनाया जा सकता।  नगर निगम को चाहिए था आपने टीम में हाइड्रो जियोलॉजिस्ट को जरूर रखते जो यहाँ के चट्टानों से परिचित हो।  हार्ड रॉक में अप्राकृतिक तरीके से वाटर रिचार्ज करना एक महंगा और आसान काम नहीं है।  अगर गलती से भी सतह का प्रदूषित जल भूमिगत जल से मिला तो स्थिति और भी भयावह हो जाएगी।  क्योंकि यही एक जल का स्रोत है जिसमे कम प्रदुषण है।  नहीं तो जिस तरीके से झारखण्ड के भूमिगत जल में फ्लोराइड एवं आर्सेनिक का जहर कुछ जगहों पर  है उसी तरीके से कई जगहों पर प्रदुषण फैलेगा।  क्योंकि यहाँ अभी भी लोगों में जागरूकता की कमी है। हो सकता है कुछ लोग गलती से अगर इसमें गन्दा पानी  डाल दिए तो आप सहज अनुमान लगा सकते हैं की स्थिति क्या होगी।

२. रांची में कौन कौन से क्षेत्र वाटर रिचार्ज जोन है लोगों को जानना जरुरी है। 

३. रांची के लगभग सभी घरों में सेप्टिक टैंक है तथा बाथरूम के पानी का अलग सोख्ता है। और अब रिचार्ज पीट भी बनाना है।  ये लोगों को जानना जरुरी है की रिचार्ज पीट और सेप्टिक टैंक के बीच दुरी कम से कम २० फ़ीट होनी चाहिए।  वैसे ही सोख्ता और रिचार्ज पिट की दुरी भी २० फ़ीट होनी चाहिए नहीं तो भूमिगत जल प्रदूषित हो जायेगा। अगर एक बार भूमिगत जल प्रदूषित हुआ तो फिर वो ठीक नहीं होगा और दूसरे स्रोत को भी प्रभावित करेगा।

४. रिचार्ज पिट घर के नींव से दूर होनी चाहिए।

५.  रिचार्ज पिट की सफाई साल में कम से कम तीन बार होनी चाहिए अन्यथा ये काम नहीं करेगा।

६. बारिश का जल अपने साथ वातावरण से तथा छतों से कुछ प्रदुषण लेके भी आता है इसपर ध्यान देना अत्यधिक जरुरी है।  छत के ऊपर लोग बहुत तरह के धातु, प्लास्टिक, और कई तरह के कचरे जमा किये रहते हैं जिनके संपर्क में आने से वर्षा जल प्रदूषित होता है।  इनमे प्रमुख है pH में बदलाव , नाइट्रेट, फॉस्फोरस , एवं भारी धातु। अगर इनपर ध्यान नहीं दिया गया तो छत पानी नीचे जा के भूमिगत जल को प्रदूषित करेगा। 

७. शोध से ये ज्ञात हुआ की हार्वेस्टेड  जल को सीधे नहीं पीना है। इसको फ़िल्टर कर के ही पीना है।  


८ .  वैसे अगर बारिश के पानी को जबरदस्ती नीचे भेजने की जगह दूसरे विधियों को अपनाया जाता तो ज्यादा प्रभावित होता।  जैसे ज्यादा से ज्यादा खुले स्थानों का होना , लोग अपने घरों के सामने के स्थान को कंक्रीट से न ढके , घांस लगाएं , नालियों को पक्का नहीं करें इत्यादि, क्योंकि छत से कई गुना अधिक बारिश का पानी  खुले स्थानों से बह के निकल जाता है। हमे इनको रोकना है।  

Monday, April 4, 2016

भारत कि नदियों में प्रदुषण का बढ़ता बोझ।


द्वारा
डा नितीश प्रियदर्शी
भूवैज्ञानिक

रांची







पिछले कुछ वर्षों में औद्योगिकीकरण एवं शहरीकरण के कारण भारत कि प्रमुख नदियों में प्रदूषण का बोझ बढ गया है। सिंचाई, पीने के लिए, बिजली तथा अन्य उद्देश्यों के लिए पानी के अंधाधुंध इस्तेमाल से चुनौती काफी बढ गयी है।

गंगा और यमुना सदियों से करोड़ों लोगों के लिए उनसे कई गुना अधिक जल-जीवों, पशु-पक्षियों के लिए जीवनदायिनी भूमिका निभाती रही हैं पर हाल के सालों में इन नदियों पर अधिक चर्चा इनके प्रदूषण और इन पर मंडरा रहे अन्य खतरों के संदर्भ में हुई है।

पिछले कुछ सालों में सरकारी, गैर-सरकारी स्तर पर इन नदियों की रक्षा के लिए कुछ प्रयास भी आरंभ हुए हैं। गंगा यमुना एक्शन प्लान इस उद्देश्य के लिए ही बनाए गए। पर इसमें सीमित सफलता ही मिल पाई है। 11वीं योजना के दस्तावेज ने मार्च से जून 2006 के आंकड़ों के आधार पर बताया है कि कन्नौज से इलाहाबाद तक अभी गंगा का पानी स्नान करने योग्य गुणवत्ता को भी प्राप्त नहीं कर पाया है। यमुना के बारे में बताया गया कि इसकी स्थिति बहुत विकट है।
उत्तरप्रदेश के पूर्वांचल को हराभरा रखने वाली एक दर्जन से ज्यादा नदियाँ मृतप्राय हो चुकी हैं। जो बची हैं उनके अस्तित्व पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। गंगा समेत सभी नदियाँ या तो प्रदूषण की मार झेल रही हैं या सूख गई हैं। नदियों के सूखने एवं उनके जल स्तर में हो रही कमी की खबरें जिस तरह से रही हैं वे किसी त्रासदी से कम नहीं हैं।

पूर्वी उत्तरप्रदेश के जिलों में जिस तरह से भूजल स्तर गिरता जा रहा है एवं पानी का संकट गंभीर होता जा रहा है, यह चिंता का विषय है। जौनपुर में गोमती एवं पीली नदी का यही हाल है। गोमती की हालत खस्ता है। पीली नदी में पानी का नामोनिशान नहीं है। गाजीपुर में मगई नदी सूख चली है। नदी की तलहटी में धूल उड़ रही है। गड़ई, तमशा, विषही, चंद्रप्रभा एवं सोन नदियों की भी हालत बदतर है। गर्मी शुरू होते-होते ये नदियाँ सूख जाती हैं और उनमें केवल धूल उड़ती रहती है।
स्था का सार्वजनिक प्रदर्शन अब पर्यावरण पर भारी पड़ रहा है। हर साल हमारे देश में कई स्थानों पर जोर-शोर से गणेशोत्सव मनाया जाता है और उसके बाद जगह-जगह दुर्गा पूजा का आयोजन होता है। एक स्थूल अनुमान के मुताबिक हर साल लगभग दस लाख मूर्तियां नदी, तालाबों और झीलों के पानी के हवाले की जाती हैं और उन पर लगे वस्त्र, आभूषण में पानी में चले जाते हैं।

चूंकि ज्यादातर मूर्तियां पानी में घुलने वाले प्लास्टर आफ पेरिस से बनी होती है, उन्हें विषैले एवं पानीे में घुलने वाले नॉन बायोडिग्रेडेबेल रंगों में रंगा जाता है, इसलिए हर साल इन मूर्तियों के विसर्जन के बाद पानी की बॉयोलॉजिकल आक्सीजन डिमांड तेजी से घट जाती है जो जलजन्य जीवों के लिए कहर बनता है। चंद साल पहले मुम्बई से वह विचलित करने वाला समाचार मिला था जब मूर्तियों के धूमधाम से विसर्जन के बाद लाखों की तादाद में जुहू किनारे मरी मछलियां पाई गई थीं।

केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा दिल्ली में यमुना नदी का अध्ययन इस संबंध में आंखें खोलने वाला रहा है कि किस तरह नदी का पानी प्रदूषित हो रहा है। बोर्ड के निष्कर्षों के मुताबिक नदी के पानी में पारा, निकल, जस्ता, लोहा, आर्सेनिक जैसी भारी धातुओं का अनुपात दिनोंदिन बढ़ रहा है।

दिल्ली के जिन-जिन इलाकों में मूर्तियां बहाई जाती हैं वहां के पानी के सैंपलों को लेकर अध्ययन करने के बाद बोर्ड ने पाया कि मूर्तियां बहाने से पानी की चालकता, ठोस पदार्थों की मौजूदगी, जैव रासायनिक आक्सीजन की मांग और घुले हुए आक्सीजन में कमी बढ़ जाती है। पांच साल पहले उसने अनुमान लगाया था कि हर साल लगभग 1799 मूर्तियां दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में बहाई जाती हैं और उसका निष्कर्ष था कि इस कर्मकाण्ड से नदी को कभी भरने लायक नुकसान हो रहा है और प्रदूषण फैल रहा है।

सबसे ज्यादा जल प्रदूषण प्लास्टर आफ पेरिस से बनी मूर्तियां के विसर्जन से होता है। इन मूर्तियों में प्रयुक्त हुए रासायनिक रंगों से भी जल प्रदूषण ज्यादा होता है। पूजा के दौरान हुआ ऐसा कचरा, जिसकी रिसाइकलिंग नहीं की जा सकती है, उससे भी जल प्रदूषण अधिक मात्रा में होता है। पिछले कई सालों से यह बात प्रकाश में आई है कि जल प्रदूषण सबसे ज्यादा प्लास्टर आफ पेरिस (पीओपी) की बनी मूर्तियों गणेश, दुर्गा के विसर्जन से होता है। ये सभी मूर्तियां झीलों, नदियों एवं समुद्रों में बहाई जाती है जिससे जलीय वातावरण में समस्या सामने आती है।

प्रदूषण रोकने के लिए  बरसों से कई बड़ी परियोजनाएं भी चल रही हैंI लेकिन नतीजे देखें तो वही ढाक के तीन पात”. प्रदूषण से हालात इतने भयावह हो गए हैं कि पेय जल तक का संकट गहरा गया है I राजधानी दिल्ली के 55 फीसद लोगों की जीवनदायिनी, उनकी प्यास बुझाने वाली- यमुना के पानी में जहरीले रसायनों की मात्रा इतनी बढ़ गई है कि उसे साफ कर पीने योग्य बनाना तक दुष्कर हो गया है

गंगा-यमुना को प्रदूषण मुक्त करने के लिए सरकार अब तक 15 अरब रुपये से अधिक खर्च कर चुकी है लेकिन उनकी वर्तमान हालत 20 साल पहले से कहीं बदतर है I गंगा को राष्ट्रीय नदी का दर्जा दिए जाने के बावजूद इसमें प्रदूषण जरा भी कम नहीं हुआ है I करोड़ों रुपये यमुना की भी सफाई के नाम पर बहा दिए गए, मगर रिहाइशी कॉलोनियों कल-कारखानों से निकलने वाले गंदे पानी का कोई माकूल इंतजाम नहीं किया गया I

झारखंड में बहने वाली नदी दामोदर को किसी जमाने में भले ही बंगाल का शोक कहा गया हो मगर इसे झारखंड का लाइफ लाइन होने का दर्जा प्राप्त है। अफसोस की बात है कि यह नदी लाइफ लाइन की जगह अब डेथलाइन में बदलती जा रही है। पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण विभाग ने इस नदी के जल में प्रदूषण की मात्रा को देखते हुए इस नदी को सी श्रेणी में शामिल किया है और इसके पानी को पीने यो' बिल्कुल भी नहीं माना है। दामोदर में स्नान की बात अब कोई नहीं करता है।दामोदर नदी के पानी में सीओडी ((केमिकल ऑक्सीजन डिमांड)) एवं बीओडी((बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड)) की मात्रा खतरनाक हद तक पहुंच चुकी है।

झारखंड की गंगा (सुवर्णरेखा) अब नहाने लायक भी नहीं रही। कुछ वर्षों पहले तक इसका पानी आसपास के लोगों के लिए अमृत समान था, लेकिन आज यह इतनी प्रदूषित हो गई है कि इसमें नहाया, चर्म रोग और पानी पीया, तो किडनी फेल होने की आशंका रहती है। यही वजह है कि पानी पीना तो दूर, शहर आसपास के लोग इसमें स्नान करने से भी कतराने लगे हैं।सुवर्णरेखा के पानी में घुलनशील ऑक्सीजन (डिजॉल्व ऑक्सीजन यानी, डीओ) हाइड्रोजन (पीएच) की मात्रा मानक स्तर से कम लेड, कैडमियम आदि तत्वों की मात्रा खतरनाक स्थिति पर पहुंच गई है। यह जलजीवों के साथ-साथ आसपास रहने वाले लोगों के लिए भी चिंताजनक है।

गोमती नदी में जलजीवों की संख्या तेजी से घट रही है। आकलन के मुताबिक 1950 की तुलना में मछलियों की संख्या एक तिहाई से भी कम हो गई है। वहीं कछुवे विलुप्त होने के कगार पर हैं। तटवासियों के अनुसार कछुवे की संख्या 1950 की तुलना में मात्र 10 प्रतिशत रह गई है।नदी में केवल पानी की मात्रा ही कम नहीं हुई है, बल्कि उपलब्ध जल की गुणवत्ता भी काफी घटिया हो गई है। पानी में प्रदूषण की सूचना तटवासियों ने दी है। पानी की गुणवत्ता इतनी खराब हो जाती है कि जानवर भी उसे पीना तो दूर सूंघकर भाग खड़े होते हैं। गोमती नदी में ऑक्सीजन की भारी कमी के कारण अब तक लाखों मछलियां मारी जा चुकी हैं।जहां एक ओर गोमती नदी में नालों के जरिए सीवर का पानी गिरता है, वहीं कई फैक्ट्रियों की ओर से जहरीला पानी भी नदी में छोड़ा जा रहा है, जिससे नदी नाले में तब्दील होती जा रही है।

मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से नर्मदा के जल की शुध्दता जांचने के लिए किए गए एक परीक्षण में पता चला है कि अमरकंटक में नर्मदा सबसे ज्यादा मैली है। सरकार द्वारा कराई जाने वाली जांचों के आंकड़े चौकाने वाले हैं। जानकार सूत्रों के अनुसार अमरकंटक और ओंकारेश्वर सहित अन्य स्थानों पर नर्मदा के जल में क्लोराइड और घुलनशील कार्बन डाई आक्साइड का स्तर खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है। लगातार मिल रही गंदगी के कारण नर्मदा का पीएच भारतीय मानक 6.5 से 8.5 के स्तर से बढ़कर 9.02 पीएच तक पहुंच गया है। इस प्रदूषित जल को पीने से लोग पेट संबंधी बीमारियों के शिकार हो रहे हैं।


अगर भारत की नदियों के प्रदुषण का यही हाल रहा तो आने वाले समय में या तो ये गायब हो जाएँगी या नालों में परिवर्तित हो जाएँगी।