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Saturday, August 6, 2011

वृक्ष कम होंगे तो कम होगा आक्सीजन .



झारखण्ड में प्रदुषण बढ़ने का भी खतरा होगा.
द्वारा
डा. नितीश प्रियदर्शी



आज पुरे विश्वा में जंगल का विनाश हो रहा हे. जंगल में लगी आग के रूप में या जंगल की कटाई के रूप में . वृक्ष हमारे वातावरण को संतुलित करते हैं. एवं जल चक्र को बनाये रखने में भी सहायक होता है. यह भू छरण को भी रोकता है. जंगल के विनाश से इनपर तो असर हो रहा हे किन्तु सबसे खतरनाक असर हमारे वातावरण में मौजूद प्राणवायु आक्सीजन पर दिख रहा है अब माना जाने लगा है की वृक्षों के कम होने से वायुमंडल में मौजूद आक्सीजन (२० %) में भी कमी होगी जो मनुष्य एवं दूसरे जंतुओं के लिये भी खतरनाक संकेत है. वृक्ष प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया द्वारा वातावरण से कार्बन ड़ाइओक्सइड को लेकर आक्सीजन मुक्त करते है. इस आक्सीजन को जीव जीवित रहने के लिये ग्रहण करते है. पृथ्वी पर वृक्षों की यदि कमी होने लगेगी तो निश्चित रूप से इसका असर आक्सीजन की मात्र पर होगा.

वृक्ष के केवल कटने से ही नहीं; जंगल में आग लगने से भी आक्सीकरण की कमी हो सकती हे क्योंकि जलने से भी आक्सीजन का इस्तेमाल होता है. आज जिन पौधे या वृक्षों के बदौलत हमारे पृथ्वी पर आक्सीजन है हम उन्ही को कम करते जा रहे हैं. एक नए शोध से यह ज्ञात हुआ है कि १९८९ और १९९४ के बीच आक्सीजन कि मात्रा पृथ्वी पर २ भाग प्रति मिलियन प्रतिवर्ष के हिसाब से कम हुई है. कम होने कि गति काफी कम होने के कारण हम इसकी घटने कि गति पर नजर नहीं रख पा रहे हैं.

वृक्ष न केवल आक्सीजन देता हे बल्कि वातावरण को भी शुद्ध एवं ठंडा रखता है. अगर झारखण्ड की ही बात ले तो पिछले कुछ वर्षों मौसम में काफी बदलाव आ रहा है. वर्षा कभी औसत से कम या नहीं हो रही है. रांची जैसा शहर जो अपने मौसम के वजह से मशहुर था आज गर्म होते जा रहे है. इसका एक प्रमुख कारण है रांची के आस पास वृक्षों का कम होते जाना.

वर्षा के कम होने की वजह से यहाँ पेयजल के अस्तित्व पर भी खतरा पैदा हो गया है. वातावरण में कार्बन ड़ाइओक्सइड के बढ़ने का भी खतरा पैदा हो गया है. वृक्षों के कम होने से झारखण्ड के वातावरण में मौजूद आक्सीजन पर भी इसका बुरा प्रभाव हो सकता है जिसका असर आने वाले समय में दिख सकता है. अगर हमारे प्रदेश में आक्सीजन की मात्रा में जरा सा भी कमी आया तो ये कहने की जरुरत नहीं की हमारा क्या हाल होगा. प्रदुषण भी खतरनाक तरीके से बढ़ेगा वो अलग.



Saturday, October 30, 2010

झारखण्ड एवं बिहार के भूमिगत जल में फैल रहा है आर्सेनिक का जहर I


बहुत सारे छेत्रों में अपना प्रभाव दिखा रहा है I
द्वारा
डा. नितीश प्रियदर्शी




आर्सेनिक शब्द का नाम आते ही नेपोलियन की याद आती है जिनके बारे में यह कहा जाता है की उनको आर्सेनिक का जहर देकर मारा गया था I
देश के कई भागों में आर्सेनिक युक्त जल पीने के कारण लोग कैंसर की चपेट में आ रहे हैं। पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, झारखण्ड तथा बिहार के अनेक गांवों में भूजल में आर्सेनिक तत्व पाए जाने की पुष्टि वैज्ञानिकों ने की है।
पश्चिम बंगाल के मालदा, मुर्शिदाबाद, वर्धमान, नाडिया, हावड़ा, हुगली, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना और कोलकाता जिलों के लोग इस पानी को पीने से विभिन्न रोगों के शिकार हो रहे हैं।
पूरे विशव मे करीब बीस मिलियन लोग इससे प्रभावित है , कई तरीकों से इससे उत्पन्न हुये रोगों से निजात पाने की चेष्टा की गयी लेकिन अभी तक कोई ठॊस परिणाम सामने नही आये हैं ।

आज पश्चिम बंगाल के कई जिले इस जहर से प्रभावित हैं. वहां के भूमिगत जलों में आर्सेनिक की मात्रा खतरनाक स्तिथि तक पहुँच चुकी है I हजारों लोग इससे प्रभावित है I
बिहार एवं झारखण्ड के भी कई जगहों पर यह जहर यहाँ के भूमिगत जल में तेजी से फैल रहा है. तथा हजारों लोग इस आर्सेनिक के जहर से त्रस्त हैं I धरती की सतही जल में इसकी उपस्थिति लगभग नगण्य होती है किन्तु जैसे जैसे पृथ्वी के भीतर की और बढ़ते हैं एवं जल पाइराइट नामक खनिज के संपर्क में रहता है आर्सेनिक की सांद्रता बढ़ती जाती है I
दोनों राज्यों में आर्सेनिक की मात्रा १० पि. पि. बी. (पार्ट्स पर बिलियन ) की संख्या को पर कर चूका है तथा अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया है I झारखण्ड में सबसे ज्यादा प्रभावित जगह है झारखंड के पूर्वी-पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला-खरसावां, कोडरमा, हजारीबाग, साहेबगंज, राजमहल, चतरा, दुमका, पाकुड़, उधवा, आदि जिले पूरी तरह आर्सेनिक की चपेट में हैं। यहाँ पर आर्सेनिक की मात्रा भूमिगत जल में खतरनाक स्तिथि तक पहुँच चुकी है एवं कई लोग इस प्रदूषित जल को पीने से विभिन्न प्रकार के चर्म रोग से त्रस्त हैं I कई लोग तो पेट सम्भंदित बिमारिओं की भी शिकायत की है I मानव शारीर में उपस्थित आर्सेनिक केंद्रीय तंत्रिका तंत्र के लिए घातक है I इसके अलावा मांसपेशिओं की कमजोरी, भूख न लगना, जी मिचलाना, जैसी बिमारियों की संभावना बढ़ सकती है I आरेसेनिक संक्रमण से त्वचा का कैन्सर , केरोटोसिस [keratoses] जैसी समस्यायें उत्पन्न हो सकती हैं ।
वैसे तो झारखण्ड से होकर बहने वाली दामोदर एवं स्वर्णरेखा नदी भी इस जहर के प्रभाव से अछूती नहीं है. इसका प्रभाव धीरे धीरे अब दिखने लगा है I सवर्णरेखा एवं दामोदर में इस जहर का स्रोत यहाँ पर उपस्थित विभिन्न उद्योग और खनिज की खानें हैं I झारखण्ड में घाटशिला के पास भी कुछ भूमिगत जालों में आर्सेनिक मिलने की सुचना है I

बिहार में सबसे ज्यादा प्रभावित छेत्र पटना , भोजपुर, वैशाली एवं भागलपुर जिले हैं I यहाँ पर आर्सेनिक की मात्रा १० पि.पि.बी. को पार कर चुकी है I यह सारे छेत्र गंगा नदी के छेत्र हैं I सबसे खतरनाक बात यह है की यहाँ के भूमिगत जलों में आर्सेनिक की मात्रा मौसम के अनुसार बदलती है I पटना के पास मनेर इस जहर से सबसे ज्यादा प्रभावित है जहाँ आर्सेनिक की मात्रा ३० पि.पि.बी. से ६० पि.पि.बी. तक पहुँच चुकी है I भोजपुर के पाण्डेय टोला एवं बरहरा में आर्सेनिक की सांद्रता १८६१ पि.पि.बी. तक पहुँच चुकी है I भागलपुर के पास कहलगांव में आर्सेनिक का जहर सबसे ज्यादा पाया गया है I दूसरा प्रभावित छेत्र है सबौर और सुल्तानगंज I मनेर में जहाँ आर्सेनिक ६० फीट की गहराई वाले कुऐं में ही मिल जा रहा है वहीँ भोजपुर में १५० फीट नीचे में आर्सेनिक मिल रहा
है I
समस्तीपुर के एक गाँव हराइल छापर में भूजल के एक नमूने में आर्सेनिक की मात्रा 2100 ppb पाई गई जो कि सर्वाधिक है।उल्लेखनीय है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पेयजल में 10 ppb की मानक मात्रा तय की है जबकि भारत सरकार के दिशानिर्देशों के अनुसार अधिकतम सुरक्षित मात्रा 50 ppb मानी जाती है।

बिहार के अन्य प्रभावित छेत्र हें बक्सर, खगरिया,कटिहार, छपरा, मुंगेर एवं दरभंगा I
आर्सेनिक का जहर अगर इसी तरह बढ़ता रहा तो दोनों राज्यों की स्थिती और भयावह हो जायगी I

Friday, September 10, 2010

भारत में प्राकृतिक आपदाएं - कितने तैयार हैं हम ?

देश के २२ राज्यों को मल्टीडिजास्टर प्रोन यानि जहाँ की एक से अधिक प्राकृतिक आपदाएं आ सकती हैं, माना गया है I
द्वारा
डा. नितीश प्रियदर्शी





विश्व में प्राकृतिक आपदाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है I पहले दक्षिण पूर्व एशिया सुनामी, अमरीका में आये तूफ़ान, कटरीना, विल्मा, मुंबई की बाढ़, पाकिस्तान एवं जम्मू कश्मीर में आये विनाशकारी भूकंप , बिहार में कोसी नदी की बाढ़ और अब पाकिस्तान में बाढ़, दिल्ली, गुजरात, पंजाब, लेह, उत्तराखंड, राजस्थान इत्यादि में बाढ़ I झारखण्ड एवं बिहार में सुखा ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है की केवल सुचना ही आपदाओं से निपट पाने के लिये पर्याप्त नहीं है I इनसे निपटने के लिये बहुत कुछ किया जाना बाकि है I
भारतीय उप महाद्वीप का लगभग सारा का सारा हिस्सा कभी न कभी प्राकृतिक आपदाओं की चपेट में आ ही जाते हैं या आ सकते हैं लेकिन इनसे निपटने के लिये जिस प्रकार से शार्ट टर्म और लॉन्ग टर्म कदम उठाये जाने की जरुरत हे उनके बारे में मामले सरकारी फाइलों में बंद हैं I भारतीय उप महाद्वीप में आनेवाली प्राकृतिक आपदाओं में प्रमुख हैं सूखा, बाढ़, समुद्री तूफान, भूकंप, भूमि धसान,जंगलों एवं कोयले के खदानों में लगी आग I देश के २२ राज्यों को मल्टीडिजास्टर प्रोन यानि जहाँ की एक से अधिक प्राकृतिक आपदाएं आ सकती हैं, माना गया है I कश्मीर से कन्याकुमारी एवं भुज से सिलचर तक फैले भूभाग में कहीं न कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ की स्तिथि लगातार बनी रहती है I
विश्व बैंक ने आपदा से जुड़े जोखिम के लिहाज से भारत को १७० देशों में ३६ वें स्थान पर रखा है 1 विश्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय उप-महाद्वीप प्राकृतिक आपदा के लिहाज से सबसे संवेदनशील है। रिपोर्ट के अनुसार भारत के ६३३ जिलों में प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से अति संवेदनशील जिले हैं। बंगाल की खाड़ी से लगे क्षेत्रों में चक्रवात, हिमालई क्षेत्रों में भूकंप, तो देश के अन्य क्षेत्रों में मानसून के समय बाढ़ जैसी आपदा होना आम बात है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बाढ़ का खतरा पहले अक्सर गंगा की तराई बेल्ट में ही रहता था लेकिन अब मिट्टी की गुणवत्ता घटने तथा कमजोर ढांचागत व्यवस्था के कारण इसका दायरा बढ़ गया है। पिछले पांच दशकों से राजस्थान, गुजरात, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र तथा तमिलनाडु जैसे राज्य भी इसकी चपेट में आने लगे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि मिट्टी की गुणवत्ता घटने और अन्य कई बदलावों के कारण अब बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा तेजी से फैलने लगी है।

आपदा प्रबंधन पर हम चर्चा तो करतें है किन्तु कोई ठोस कदम नहीं उठा पाते I यदि हम उठाते भी हैं तो झटके से, एवं फिर उन्हे अगली आपदा के आने तक भुला दिया जाता है I जब दुबारा प्राकृतिक आपदा का सामना होता है तो सारी व्यवस्थाएँ धरी की धरी रह जाती हैं I जैसे मुंबई की बाढ़, लेह एवं उत्तराखंड में बादल का फटना, कोसी नदी का बाढ़ इत्यादि I
सुनामी तथा मुंबई की बाढ़ में तो हमारी सारी संचार प्रणाली एवं सुचना तंत्र ही फेल हो गया था I सुनामी ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया की हम इस प्रकार की आपदाओं से अपनों की रक्षा करने एवं इस प्रकार की स्तिथि से निपटने के लिये कतई तैयार नहीं थे I
भारत में कई कोयले की खानें ऐसे है जहाँ पहले भी कई हादसे हो चुकें हैं तथा आगे भी होने का खतरा बना रहता है लेकिन आज तक हम इन्हे रोकने या इसकी सुचना पहले देने में विफल हैं I
विश्व की जलवायु बादल रही है I पृथ्वी गर्म हो रही है I इसका असर विश्व के साथ साथ भारत पर भी अपना प्रभाव दिखा रहा है, जो आने वाले वर्षों में अनेक प्रकार की आपदाओं के आगमन का अशुभ संकेत दे रहा है I
यदि हम भूकंप को ही लें तो कुछ तथ्य चोकाने वाले हैं. यूनेस्को के अनुसार विश्व में प्रतिवर्ष ६०,००० भूकंप आते हैं I भारत में भी पिछले १०० वर्षों कई विनाशकारी भूकंप आ चुकें हैं जिनमे एक लाख से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है I भारत के कई नए प्रदेश भूकंप से प्रभावित होने वाले प्रदेशों मे आ गए जो पहले नहीं थे I आज अगर दिल्ली अथवा मुंबई अथवा बिहार या उत्तर प्रदेश के किसी घने आबादी वाले स्थान पर ५ या उससे अधिक तीव्रता वाला भूकंप आता है तो क्या हम तैयार हैं? वैसे भी इन स्थानों पर काफी दिनों से कोई भूकंपीय हलचल नहीं हुआ है I ये स्थान सिस्मिक जोन में भी आता है I

भारत में और भी प्राकृतिक आपदाएं है जिनका जिक्र कभी कभार ही होता है जैसे आसमान से बिजली का गिरना , ओलावृष्टि , डेंगू, मलेरिया, इत्यादि I इनसे प्रति वर्ष हजारों लोग प्रभावित होतें हैं I झारखण्ड एवं बिहार मिलाकर इस वर्ष आसमान से बिजली गिरने से लगभग २०० लोगों की आकाल मृत्यु हो चुकी है जिनमे बच्चों तथा महिलाओं की संख्या ज्यादा है I पूर्वी उत्तर प्रदेश में हर वर्ष कई बच्चे रहस्यमई बीमारी से ग्रसित हो जाते है I इस तरह हर वर्ष कई लोग प्राकृतिक आपदाओं के चलते आकाल मृत्यु को प्राप्त होते है I
भारत प्राकृतिक विविधता वाला देश है अतः आपदा प्रबंधन निश्चय ही एक महत्वपूर्ण चुनौती है I

Monday, December 14, 2009

क्या है समुद्र के नीचे लेमुरिया महाद्वीप का रहस्य?


क्या है समुद्र के नीचे लेमुरिया महाद्वीप का रहस्य ? क्या बदलते तापमान ने इन्हे डुबाया ?
झारखण्ड की मुंडा जाती भी शायद इसी महाद्वीप से होते हुए भारत पहुँची।
द्वारा
डा। नितीश प्रियदर्शी

आज सारे विश्व के वैज्ञानिक इस बात पर सहमत हैं की आने वाले समय में पृथ्वी पर कई विनाशकारी बदलाव होंगे। कारन है ग्लोबल वार्मिंग । कई छोटे द्वीप समुद्र में समां जायंगे । कहीं सूखे की मार होगी तो कहीं अतिवृष्टि । कई नए जगह भूकंप प्रभावित होंगे जो पहले नही थे । यानि विनाश का एक नया रूप सामने आएगा।

कुछ खोजकर्ता इस बात का दावा कर रहें हैं की माया सभ्यता के कैलेंडर मे इस बात का जिक्र है की सन २०१२, २१ दिसम्बर को पृथ्वी का विनाश हो जाएगा।ऐसी बात नही हे की आने वाले समय में ही विनाश होगा । विनाश अगर होगा भी तो अचानक नही । विनाश की प्रक्रिया धीरे धीरे होती है जैसे पहले हुई थी । जब से पृथ्वी बनी है विनाश के कई चरण हुए है जब कई प्रजातियाँ विलुप्त हुई तथा नई आई हैं। विश्व के सभी जातिओं एवं धर्मो में प्राचीन महाप्रलय का उल्लेख मिलता है । केवल धर्मं ही नही भूवैज्ञानिक साक्ष्य भी पृथ्वी पर कई प्राचीन विनाशकारी हलचल को दर्शाता है। चाहे वो भूकंप के रूप मे हो या ज्वालामुखी के रूप मे या ग्लोबल वार्मिंग या हिमयुग के रूप मे हो। विश्व के सभी धर्मो में जल को ही महाप्रलय का कारण माना गया है। यहाँ तक की सभी आदिम जन जातिओं मे भी जल महाप्रलय का उल्लेख कहानिओं के रूप में हुआ है।इसी क्रम में दो महाद्वीपों का नाम उभर कर आता है जो आज महासागर के नीचे है। इनका नाम है "लेमुरिया एवं मु”। वेसे इन द्वीपों का अभी तक वेज्ञानिक पुष्टि नही हो पाई है। लेकिन विश्व के खोजकर्ताओं का दावा है की यह दोनों महाद्वीप पर सभ्यता काफी विकसित थी। कुछ खोजकर्ताओं, जिनमे प्रमुख थे फिलिप स्कोल्टर , का यह भी कहना था की मनुष्य की उत्पत्ति इन्ही महाद्वीपों पर हुई थी। ये दोनों महाद्वीप किसी भूवैज्ञानिक हलचल के वजह से समुद्र के भीतर समां गए।

एक रोचक तथ्य यह सामने उभर कर सामने आया है की हमलोग की आगे की पीढ़ी शायद फिर लेमुरिया द्वीप पर वास करे। खोजकर्ताओं का मानना है की जिस तरीके से लेमुरिया द्वीप समुद्र के अन्दर समां गया शायद भविष्य मैं किसी प्लेट टेक्टोनिक या किसी भूगर्भीय हलचल की वजह से यह द्वीप समुद्र के ऊपर आ जाए। एक और रोचक तथ्य सामने यह आया है की लेमुरिया द्वीप के लोग काफ़ी लंबे होते थे। उनके पास तीसरा आँख भी था जो सर के पीछे होता था। यही आँख आज के मनुष्य मैं pineal eye के नाम से जाना जाता है। इसका अब कोई कम नही है। लेकिन इसपर अभी कोई खोज नही हुआ है।एसा माना जाता है की लेमुरिया महाद्वीप हिंद महासागर के नीचे एवं मु महाद्वीप प्रशांत महासागर के नीचे समा गया। खोजकर्ताओं की माने तो "मु" महाद्वीप ५०,००० वर्ष पहले तक था एवं "लेमुरिया द्वीप" की उत्पत्ति एक लाख साल पहले हुई थी।ऐसा लगता है जिस वक्त ये दोनों महाद्वीप समुद्र के नीचे समाये उस वक्त पृथ्वी का तापमान आज के तुलना में ज्यादा रहा होगा जिसके चलते हिमनदों के पिघलने से समुद्र का जलस्तर ऊँचा उठा एवं इन दोनों महाद्वीपों को धीरे धीरे अपने भीतर समां लिया। वेसे भी आज के बढ़ते तापमान की वजह से विश्व के कई छोटे छोटे द्वीप खतरें मैं आ गए है।
पहले भी हमारे पृथ्वी पर कई बदलाव हुए आज जहाँ पर सुखी जमीन है वहां पहले समुद्र हुआ करता था। आज जहाँ रेगिस्तान है वहां पहले हरियाली हुआ करती थी। पृथ्वी पर प्राचीन काल के जिओलोजिकल विनाश के अवशेष आज भी मिलते है । एल्फ्रेड रसेल एवं एर्नेस्ट हेकेल का मानना था की मनुष्य की उत्पत्ति इन महाद्वीपों पर हुई थी। लेमुरिया शब्द लेमूर नामक जीव से आया जो बन्दर एवं गिलहरी का मिश्रित रूप है। लेमूर का मूल स्थान मेडागास्कर है लेकिन यह भारत एवं मलाया मे भी पाया जाता है। इसलिये यह माना गया की ये जीव तभी भारत पहुंचें होंगे जब कोई विशाल महाद्वीप हिंद महासागर में रहा होगा एवं जो भारत एवं मेडागास्कर के बिच में सेतु का काम किया।

वैज्ञानिक मानते हैं की भारत उप महाद्वीप में किसी नर-वानर की उत्पत्ति नही हुई थी। अतः जितनी भी जातियां भारत की धरती पर जीवित हैं या लुप्त हो चुकीं हैंउनका मूल स्थान कहीं न कहीं भारत से बाहर रहा था। झारखण्ड के मुंडाओं के मूल स्थान तथा उनके आव्रजन मार्ग की खोग में लेमुरिया सिद्धांत का उल्लेख हुआ है।एस सी रॉय ने इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया है। श्री रॉय ने दक्षिण अफ्रीका एवं दक्षिण भारत के बिच एक लेमुरिया द्वीप की कल्पना की है जो अब जलमग्न हो चुका है। उन्होंने संभावना व्यक्त की है की मुंडा जाती लेमुरिया द्वीप से होती हुए भारत आई थी। इस प्रसंग में दक्षिण अफ्रीका के मेडागास्कर का नाम उल्लेखित हुआ है। इस मत के अनुसार मुंडाओं का मूल स्थान मेडागास्कर है और भारत आव्रजन "लेमुरिया द्वीप" से होते हुए हुआ है।अब सवाल यह उठता है की अगर यह दोनों महाद्वीप थे तो ये समुद्र में कैसे समा गए। क्या समुद्र के बढ़ते जलस्तर ने इनको अपने अन्दर समा लिया या किसी भुवेज्ञानिक हलचल के चलते यह महासागर के अन्दर चले गए । अभी भी इसपर खोज जारी है।सवाल लेमुरिया या मु का नहीं है । सवाल यह है की अगर पृथ्वी का तापमान यूँ ही बढ़ता रहा तो आने वाले समय में कोई दूसरा लेमुरिया या मु जैसी घटना होने से इंकार नही किया जा सकता।

Monday, October 26, 2009

झारखण्ड में ध्वस्त होते पर्वत.

अन्गारा का ध्वस्त पहाढ़ एक भुवेज्ञानिक घटना - और भी पहाढ़ हो सकते हैं ध्वस्त ।

डॉ। नितीश प्रियदर्शी

६ अक्टूबर की रात रांची के पास अन्गारा के एक गाँव में २५० फीट ऊँचा पहाढ़ अचानक तेज आवाज के साथ ध्वस्त हो गया। वेसे तो पहाढ़ धसने की घटना विश्व मैं कई जगह होती है जैसे २४ अगस्त को बांग्लादेश के चटगांव में एक ऊँचा पहाढ़ ध्वस्त हो गया। एक हफ्ता पहले बांग्लादेश में ही तन्किर पहाढ़ के ध्वस्त हो जाने से ११ लोग की मृत्यु हो गई । उसी तरह ३ अक्टूबर को अमेरिका के कैलिफोर्निया शहर के पास एक काफी ऊँचा पहाढ़ ध्वस्त हो गया जिसके चलते कई मकानों को नुकसान पहुँचा।

अन्गारा एवं दुसरे जगहों में पवर्तों के ध्वस्त होने के कारणों में असामनता हैं। जहाँ बांग्लादेश में पहाढ़ ध्वस्त होने के पहले भूकंप आया था तथा कैलिफोर्निया में कुछ दिन पहले से पत्थर पर्वत से नीचे आ रहे थे वहीँ अन्गारा में ये सब कारण नदारद थे। यहाँ पहाढ़ अचानक रातों रात ध्वस्त हो गया बिना किसी भूकंप अथवा किसी अन्य भूगर्भीय हलचल के। वेसे विश्व में जहाँ जहाँ ज्वालामुखी विस्फोट होता है वहां पर इस तरह की पहाढ़ गिरने की घटना होती है। लेकिन अन्गारा में पहाढ़ ध्वस्त होने का कारण कुछ और ही लगता है।

रांची के आस पास की बहुत से छोटे एवं मध्यम ऊंचाई के पहाढ़ काफी वृद्ध हो चुके हें तथा वे काफी अपरदित हो चुकें हैं जैसे रांची पहाढ़ , पिठोरिया के पास की कुछ पहाढ़ इत्यादि। यानि ये सब अपरदन के चक्र के अन्तिम चरण में पहुँच चुके हें। पिछले वर्ष रांची पहाढ़ का कुछ हिस्सा भी धंसा था जिससे वहां के लोगों में डर व्याप्त हो गया था।

अन्गारा के पहाढ़ के अचानक ध्वस्त होने का एक ही कारण नजर आता है वह है काफी ज्यादा अपरदन के फलस्वरूप तथा पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में पहाढ़ ध्वस्त हो गया। इस को भूविज्ञान की भाषा में "मास वेस्टिंग" कहतें हें जहाँ पहाढ़ पर उपस्थित किसी खास कमजोर स्थान से अचानक मिटटी एवं बोल्डर गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में तेजी से नीचे आवाज करता हुआ घिसकने लगता हें। अन्गारा में जहाँ पर यह धसान हुआ वहां पर कई वृक्ष भी मलबे के अन्दर दब गए।

झारखण्ड में प्रकृति ने अपना संदेश दे दिया है। जरुरत इस बात की है की रांची के आस पास वेसे पहाढ़ की पहचान की जाए जो काफी अपरदित हो चुके हें या जिनके बहुत से भाग मिटटी में परिवर्तित हो चुके हों, एवं उनमे मौजूद चट्टान खतरनाक स्तिथि में टिके हों । ये भी जरुरी है की अपरदित पहाढ़ के आस पास जो आबादी हो उनको इस खतरे से आगाह किया जाए ।

Monday, August 25, 2008

क्या मानव निर्मित है गंगा नदी ?

क्या मानव निर्मित है गंगा नदी ?

झारखण्ड के राजमहल मे है कुछ रहस्य ।

डा नीतिश प्रियदर्शी

ऐसा माना जाता है की गंगा नदी को पृथ्वी पर लाने का श्रेय रजा भगीरथ को जाता है। तो क्या गंगा नदी प्राचीन मानवों द्वारा निर्मित है ।

सत्रव्हीं शताब्दी मैं अंग्रेज शोधकर्ताओं द्वारा गंगा नदी के प्रवाह का विस्तृत सर्वे किया गया । इनमें प्रमुख थे कैप्टेन हर्बर्ट , रेनल , सर विलियम विल्कोक्स । उन्होनें गंगा नदी छेत्र का भूवैज्ञानिक सर्वे किया तथा पाया की गंगा प्राकृतिक न होकर मानवनिर्मित है ।

प्राचीन पुस्तक गंगावतरण मैं विस्तार से गंगा नदी के निर्माण का वर्णन है । इस पुस्तक के अनुसार इसको बनाने मैं पाँच राजाओं का योगदान है जिसकी शुरुआत रजा सागर, उनके ६०,००० पुत्र , उनके वंशज अंशुमन , राजा दिलीप तथा अंत मैं राजा भगीरथ जिन्होनें इस पवित्र नदी को समुद्र तक लाने मे सफलता पाई ।

राजा सागर जो उस वक्त हिमालय के गोमुख के पास भृगु ऋषि के आश्रम के पास तपस्या कर रहे थे , पाया की गंगोत्री के पास अथाह जल है तथा यदि इस हिमनद के जल को मैदानी छेत्र मे लाया जाय तो उनके राष्ट्र का कल्याण होगा । वैसे गंगा नदी को हिमालय से मैदानी छेत्रों मे लाने के पीछे कई पौराणिक कहानियाँ हैं।

राजा सागर के स्वप्नों को पुरा करने के लिये उनकें पुत्रों ने नहर बनाना शुरू किया जो धीरे धीरे पाताल लोक (दक्षिण की तरफ़ ) की तरफ बढ़ने लगा । जब वे झारखण्ड के राजमहल के छेत्र मे पहुंचे , तो शोध के अनुसार यहीं पर कपिल मुनि नामक साधू से उनका युद्ध हुआ तथा सारे सागर पुत्र भस्म हो गए ।

शोधानुसार , राजमहल के छेत्र का यदि भुवेज्ञानिक विश्लेषण करें तो पाएंगे की वहां ज्वालामुखी विस्फोट के अवशेष है। तो क्या सागर पुत्र जब नाहर खोदते हुए राजमहल पहुंचे तो वे ज्वालामुखी विस्फोट के चपेट आकर भस्म हो गए । किंतु इस तथ्य पर मतभेद हो सकता है क्योंकि राजमहल के ज्वालामुखी विस्फोट का समय जुरासिक काल का है और उस वक्त के मानव का अवशेष पृथ्वी पर नहीं पाया गया है । इसका मतलब है की कारण कुछ और था । हो सकता है की कुछ कारण वश गर्मी अचानक इतनी बढ़ गई की सागर पुत्र उसके चपेट मे आकर भस्म हो गए । आज अगर हम झारखण्ड के राजमहल छेत्र का विस्तार से भूवैज्ञानिक तथा भुभोतिकी शोध करें तो कई रहस्यों से परदा उठ सकता है।

झारखण्ड के जनजातियों के लेखों मैं कई बार अग्निवर्षा का जिक्र आता है तो क्या सागर पुत्र राजमहल मैं इस अग्निवर्षा के चपेट मैं आ गए ।

सागर पुत्रों के बाद उनकें पुत्रों मे से एक राजा अंशुमन ने इस कार्य को आगे तक ले गए ।

जब हिमालय से राजमहल तक गंगा नदी का रास्ता बन गया तो अब राजा भगीरथ ने गंगा नदी के जल को इस रास्ता से ले गए ।

जिस गंगा को लाने के लिये इतनी कोशिश की गई आज यही अंत होने जा रही है ।