झारखण्ड में प्रदुषण बढ़ने का भी खतरा होगा.
द्वारा
डा. नितीश प्रियदर्शी
It will cover all types environmental and geological research work and studies both ancient and present. It will also cover impact of environment and geology on the human civilization. All types of news from all over the world related to environment and geology will also be discussed here.



अन्गारा का ध्वस्त पहाढ़ एक भुवेज्ञानिक घटना - और भी पहाढ़ हो सकते हैं ध्वस्त ।
डॉ। नितीश प्रियदर्शी
६ अक्टूबर की रात रांची के पास अन्गारा के एक गाँव में २५० फीट ऊँचा पहाढ़ अचानक तेज आवाज के साथ ध्वस्त हो गया। वेसे तो पहाढ़ धसने की घटना विश्व मैं कई जगह होती है जैसे २४ अगस्त को बांग्लादेश के चटगांव में एक ऊँचा पहाढ़ ध्वस्त हो गया। एक हफ्ता पहले बांग्लादेश में ही तन्किर पहाढ़ के ध्वस्त हो जाने से ११ लोग की मृत्यु हो गई । उसी तरह ३ अक्टूबर को अमेरिका के कैलिफोर्निया शहर के पास एक काफी ऊँचा पहाढ़ ध्वस्त हो गया जिसके चलते कई मकानों को नुकसान पहुँचा।
अन्गारा एवं दुसरे जगहों में पवर्तों के ध्वस्त होने के कारणों में असामनता हैं। जहाँ बांग्लादेश में पहाढ़ ध्वस्त होने के पहले भूकंप आया था तथा कैलिफोर्निया में कुछ दिन पहले से पत्थर पर्वत से नीचे आ रहे थे वहीँ अन्गारा में ये सब कारण नदारद थे। यहाँ पहाढ़ अचानक रातों रात ध्वस्त हो गया बिना किसी भूकंप अथवा किसी अन्य भूगर्भीय हलचल के। वेसे विश्व में जहाँ जहाँ ज्वालामुखी विस्फोट होता है वहां पर इस तरह की पहाढ़ गिरने की घटना होती है। लेकिन अन्गारा में पहाढ़ ध्वस्त होने का कारण कुछ और ही लगता है।
रांची के आस पास की बहुत से छोटे एवं मध्यम ऊंचाई के पहाढ़ काफी वृद्ध हो चुके हें तथा वे काफी अपरदित हो चुकें हैं जैसे रांची पहाढ़ , पिठोरिया के पास की कुछ पहाढ़ इत्यादि। यानि ये सब अपरदन के चक्र के अन्तिम चरण में पहुँच चुके हें। पिछले वर्ष रांची पहाढ़ का कुछ हिस्सा भी धंसा था जिससे वहां के लोगों में डर व्याप्त हो गया था।
अन्गारा के पहाढ़ के अचानक ध्वस्त होने का एक ही कारण नजर आता है वह है काफी ज्यादा अपरदन के फलस्वरूप तथा पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में पहाढ़ ध्वस्त हो गया। इस को भूविज्ञान की भाषा में "मास वेस्टिंग" कहतें हें जहाँ पहाढ़ पर उपस्थित किसी खास कमजोर स्थान से अचानक मिटटी एवं बोल्डर गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में तेजी से नीचे आवाज करता हुआ घिसकने लगता हें। अन्गारा में जहाँ पर यह धसान हुआ वहां पर कई वृक्ष भी मलबे के अन्दर दब गए।
झारखण्ड में प्रकृति ने अपना संदेश दे दिया है। जरुरत इस बात की है की रांची के आस पास वेसे पहाढ़ की पहचान की जाए जो काफी अपरदित हो चुके हें या जिनके बहुत से भाग मिटटी में परिवर्तित हो चुके हों, एवं उनमे मौजूद चट्टान खतरनाक स्तिथि में टिके हों । ये भी जरुरी है की अपरदित पहाढ़ के आस पास जो आबादी हो उनको इस खतरे से आगाह किया जाए ।
क्या मानव निर्मित है गंगा नदी ?
झारखण्ड के राजमहल मे है कुछ रहस्य ।
डा नीतिश प्रियदर्शी
ऐसा माना जाता है की गंगा नदी को पृथ्वी पर लाने का श्रेय रजा भगीरथ को जाता है। तो क्या गंगा नदी प्राचीन मानवों द्वारा निर्मित है ।
सत्रव्हीं शताब्दी मैं अंग्रेज शोधकर्ताओं द्वारा गंगा नदी के प्रवाह का विस्तृत सर्वे किया गया । इनमें प्रमुख थे कैप्टेन हर्बर्ट , रेनल , सर विलियम विल्कोक्स । उन्होनें गंगा नदी छेत्र का भूवैज्ञानिक सर्वे किया तथा पाया की गंगा प्राकृतिक न होकर मानवनिर्मित है ।
प्राचीन पुस्तक गंगावतरण मैं विस्तार से गंगा नदी के निर्माण का वर्णन है । इस पुस्तक के अनुसार इसको बनाने मैं पाँच राजाओं का योगदान है जिसकी शुरुआत रजा सागर, उनके ६०,००० पुत्र , उनके वंशज अंशुमन , राजा दिलीप तथा अंत मैं राजा भगीरथ जिन्होनें इस पवित्र नदी को समुद्र तक लाने मे सफलता पाई ।
राजा सागर जो उस वक्त हिमालय के गोमुख के पास भृगु ऋषि के आश्रम के पास तपस्या कर रहे थे , पाया की गंगोत्री के पास अथाह जल है तथा यदि इस हिमनद के जल को मैदानी छेत्र मे लाया जाय तो उनके राष्ट्र का कल्याण होगा । वैसे गंगा नदी को हिमालय से मैदानी छेत्रों मे लाने के पीछे कई पौराणिक कहानियाँ हैं।
राजा सागर के स्वप्नों को पुरा करने के लिये उनकें पुत्रों ने नहर बनाना शुरू किया जो धीरे धीरे पाताल लोक (दक्षिण की तरफ़ ) की तरफ बढ़ने लगा । जब वे झारखण्ड के राजमहल के छेत्र मे पहुंचे , तो शोध के अनुसार यहीं पर कपिल मुनि नामक साधू से उनका युद्ध हुआ तथा सारे सागर पुत्र भस्म हो गए ।
शोधानुसार , राजमहल के छेत्र का यदि भुवेज्ञानिक विश्लेषण करें तो पाएंगे की वहां ज्वालामुखी विस्फोट के अवशेष है। तो क्या सागर पुत्र जब नाहर खोदते हुए राजमहल पहुंचे तो वे ज्वालामुखी विस्फोट के चपेट आकर भस्म हो गए । किंतु इस तथ्य पर मतभेद हो सकता है क्योंकि राजमहल के ज्वालामुखी विस्फोट का समय जुरासिक काल का है और उस वक्त के मानव का अवशेष पृथ्वी पर नहीं पाया गया है । इसका मतलब है की कारण कुछ और था । हो सकता है की कुछ कारण वश गर्मी अचानक इतनी बढ़ गई की सागर पुत्र उसके चपेट मे आकर भस्म हो गए । आज अगर हम झारखण्ड के राजमहल छेत्र का विस्तार से भूवैज्ञानिक तथा भुभोतिकी शोध करें तो कई रहस्यों से परदा उठ सकता है।
झारखण्ड के जनजातियों के लेखों मैं कई बार अग्निवर्षा का जिक्र आता है तो क्या सागर पुत्र राजमहल मैं इस अग्निवर्षा के चपेट मैं आ गए ।
सागर पुत्रों के बाद उनकें पुत्रों मे से एक राजा अंशुमन ने इस कार्य को आगे तक ले गए ।
जब हिमालय से राजमहल तक गंगा नदी का रास्ता बन गया तो अब राजा भगीरथ ने गंगा नदी के जल को इस रास्ता से ले गए ।
जिस गंगा को लाने के लिये इतनी कोशिश की गई आज यही अंत होने जा रही है ।